डॉक्टर सैय्यद खालिद क़ैस एडवोकेट
लेखक, समीक्षक, विधि विधार्थी
01 जुलाई से सारे देश में तीन नये कानून अस्तित्व में आ गए, केंद्र सरकार ने अंग्रेज़ी शासन के कानून बदलने की घोषणा के साथ तीन नये कानून देश पर थोप दिये। थोप दिये मैंने इसलिए कहा क्योंकि वर्तमान समय में उनकी ज़रूरत नहीं थी। कानूनों में सुधार की ज़रूरत से इंकार नहीं किया जा सकता लेकिन नये सिरे से तीन कानूनों को बनाकर केंद्र सरकार ने सारे देश मे एक चर्चा को आमंत्रित किया है।
अपनी पीठ आप थपथपाने वाली केंद्र सरकार लाख इन कानूनों की हिमायत करे लेकिन वास्तविकता इससे परे है। तमिलनाडु में इसके विरोध के बाद जहाँ स्थानीय सरकार ने इसकी समीक्षा के लिए एक उच्च स्तरीय समिति का गठन किया है, तमिलनाडु सरकार ने मद्रास उच्च न्यायालय के एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक सदस्यीय समिति गठित की, जो एक जुलाई से लागू हुए तीन नए आपराधिक कानूनों में राज्य द्वारा किए जा सकने वाले संशोधनों और नाम परिवर्तन का अध्ययन करेगी …न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) एम सत्यनारायणन तीन नए कानूनों – भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस), 2023, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस), 2023, भारतीय साक्ष्य अधिनियम (बीएसए), 2023 – का अध्ययन करेंगे और एक महीने में रिपोर्ट प्रस्तुत करेंगे। यह इस बात का प्रमाण है कि केंद्र सरकार द्वारा थोपे गए कानूनों को सहज रूप से स्वीकारा नहीं जा रहा है। तमिलनाडु सरकार अकेली विरोध में नहीं है वरन संपूर्ण विपक्ष इसके विरोध में खड़ा है। अंग्रेज़ी काल के कानून कहने वाली सरकार इसके नाम और धाराओं की संख्या में परिवर्तन के अलावा इसमें कोई परिवर्तन की हो ऐसा दृष्टिगत नज़र नहीं आता। सीधे शब्दों में कहा जाए तो तीनों कानून कापी पेस्ट के सिवा कुछ नही हैं।
टीएमसी के सांसद ओ’ब्रायन ने इसके विरोध में कहा था कि 93% मौजूदा कानून बरकरार हैं, 22 में से 18 अध्यायों को कॉपी-पेस्ट किया गया है, जिसका अर्थ है कि इन परिवर्तनों को शामिल करने के लिए मौजूदा कानूनों में बदलाव किया जा सकता था।
गत वर्ष इसका विरोध करने वाले सांसदों ने यह भी कहा था कि राज्य सरकारों, बार एसोसिएशनों, राज्य और केंद्रीय पुलिस, राष्ट्रीय विधि विद्यालय विश्वविद्यालयों, अधीनस्थ न्यायपालिका के न्यायाधीशों, सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों के प्रतिष्ठित सेवानिवृत्त न्यायाधीशों या कानूनी विद्वानों जैसे महत्वपूर्ण हितधारकों से परामर्श नहीं किया गया।
गौर तलब हो कि तीनों विवादास्पद कानूनों को ‘लोक सभा’ या राज्य सभा में बिना किसी सार्थक बहस या चर्चा के पारित कर दिया गया था।
विचारणीय बिंदु यह है कि आम धारणा के विपरीत, सीआरपीसी (जिसे भारतीय न्याय संहिता से बदल दिया गया था) मैकालेयन काल का अवशेष नहीं कहा जा सकता है क्योंकि छह भारतीय विधि आयोगों ने एक भारतीय कानून बनाने में 13 वर्ष लगाये हैं, जिसे बाद में भारतीय संसद द्वारा (1973 में) पारित किया गया, तो वर्तमान कानून को किसी भी तरह से ‘औपनिवेशिक’ दृष्टिकोण नहीं कहा जा सकता है।
तीन नए कानूनों – भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस), 2023, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस), 2023, भारतीय साक्ष्य अधिनियम (बीएसए), 2023 कानून भारतीय न्यायिक प्रणाली पर दबाव डाल सकते हैं, जिसके बारे में स्वयं मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ ने कहा था कि यह दुनिया में सबसे कम न्यायाधीश-जनसंख्या अनुपात वाले देशों में से एक है।
1 जुलाई को कानून लागू होने के साथ ही 36 मिलियन मामलों की बाधा तुरंत खड़ी हो गई। राष्ट्रीय न्यायिक ग्रिड के अनुसार, नये कानून लागू होने से पहले भारतीय अदालतों में लंबित आपराधिक मामलों की संख्या 36 मिलियन थी। इनमें से 34 मिलियन मामले जिला और तालुका अदालतों में हैं। 1.7 मिलियन मामले उच्च न्यायालयों में और 18,122 मामले सर्वोच्च न्यायालय में हैं। ये सभी मामले पुराने कानूनों के तहत चलते हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि ये कानून भारी मात्रा में – कुछ लोगों के अनुसार 95% तक – उन कानूनों से उधार लिए गए हैं, जिन्हें वे ‘प्रतिस्थापित’ करते हैं और ये हमें औपनिवेशिक दासता से मुक्त करने में भी सहायक नहीं हैं।
नए कानून निश्चित रूप से कार्यवाही में और अधिक देरी करेंगे क्योंकि उनकी प्रकृति बहुत अस्पष्ट है, जिससे भारी भ्रम पैदा होगा। उदाहरण के लिए, 1 जुलाई या उसके बाद समाप्त होने वाले प्रत्येक पुलिस रिमांड में, पुलिस बीएनएसएस या रिमांड कानून की धारा 187 के तहत अतिरिक्त समय अवधि का दावा कर सकती है, जबकि आरोपी इस आधार पर इसका विरोध कर सकता है कि प्रक्रिया के नियम बदल गए हैं।
यहां तक कि बीएनएसएस की धारा 531 के तहत निरसन और बचत खंड (जो 1 जुलाई से पहले के मामलों को सीआरपीसी का उपयोग करके तय करने की अनुमति देता है) भी इस स्थिति में किसी की मदद नहीं करेगा और केवल मामलों को और जटिल करेगा क्योंकि यह केवल उन स्थितियों पर लागू होता है जहां समय सीमा 1 जुलाई 2024 को समाप्त हो गई है। यदि कुछ करने की समय सीमा अभी भी लंबित है तो कौन सा कानून लागू होगा? किसी भी विधायी मार्गदर्शन के अभाव में क्या लागू करना है, यह तय करने के लिए एक न्यायाधीश को छोड़ दिया जाएगा।”
“भारत में ट्रायल कोर्ट में एक आपराधिक मामले की औसत अवधि लगभग पांच से सात वर्ष होती है। इसके बाद आरोपियों की संख्या, गवाहों की संख्या, दस्तावेजों, जब्त वस्तुओं और वस्तुओं की संख्या तथा प्रत्येक तारीख पर उनकी समय पर उपलब्धता जैसी जटिलताओं के साथ समय बढ़ता जाता है।
बीएनएसएस (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता) की धारा 531 के तहत सीआरपीसी (दंड प्रक्रिया संहिता) के लागू होने के दौरान दर्ज किए गए किसी मामले से उत्पन्न अपील या पुनरीक्षण सीआरपीसी द्वारा शासित होगा, न कि बीएनएसएस द्वारा। इसका मतलब है कि सर्वोच्च न्यायालय तक की अपील और पुनरीक्षण सीआरपीसी द्वारा शासित होंगे। इसमें 20 साल और लग सकते हैं। इसलिए, सीआरपीसी को किसी जादू की छड़ी से मिटाया नहीं जा सकता है। यह अभी भी 20 से 30 साल तक बना रहेगा जब तक कि अंतिम मामलों का निपटारा नहीं हो जाता।”
पुलिस के लिए सिरदर्द
फिर, नए कानूनों के कारण पुलिस बल पर समस्याएं आ गई हैं। केरल के पूर्व अभियोजन महानिदेशक आसफ अली बताते हैं कि राज्य नए कानूनों के कई प्रावधानों से निपटने के लिए पूरी तरह तैयार नहीं है।
उन्होंने बताया, “कई प्रावधानों के लिए लिखा है ‘राज्य सरकार द्वारा निर्धारित कानून के अनुसार’। इससे बड़ा भ्रम पैदा होता है, क्योंकि राज्य सरकार ने उस विशेष स्थिति से निपटने के लिए कोई कानून नहीं बनाया है या कोई आदेश निर्धारित नहीं किया है।”
आसफ अली ने यह भी बताया कि अधिकांश पुलिस स्टेशनों में इन नए कानूनों द्वारा निर्धारित ऑनलाइन पंजीकरण को लागू करने के लिए बुनियादी ढांचे का अभाव है।
उन्होंने पूछा, “जीरो एफआईआर के आगमन के साथ, सब कुछ ऑनलाइन करना होगा। इस देश में कितने पुलिस स्टेशनों में ऐसी सुविधाएं हैं और लोग जानते हैं कि पूरी तरह से डिजिटल बनने के लिए ऐसी सुविधाओं का उपयोग कैसे किया जाए?”
इसके अलावा, गांवों और कस्बों में कई पुलिसकर्मियों को किसी मामले में की गई जब्ती को डिजिटल रूप से दर्ज करने में कठिनाई का सामना करना पड़ सकता है।
ऐसी संभावित समस्याएं यह प्रश्न उठाती हैं कि क्या इन कानूनों को संसद में सभी को शामिल करते हुए विचार-विमर्श के बाद अपनाया जा सकता था, बजाय इसके कि इन्हें जबरन पारित कर दिया गया।

शुभोधुती कुमार मंडल, संपादक – वर्ल्ड मीडिया न्यूज़, संपादक – फ्यूचर टी.वी., समाचार पत्र, न्यूज़ पोर्टल, न्यूज़ वेबसाइट,
(वर्ल्ड रिकॉर्ड होल्डर, राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय अवार्ड, सम्मान पत्र द्वारा सम्मानित)
कार्यालय – वर्ल्ड मीडिया न्यूज़, शिव मंदिर रोड, आवास विकास, रूद्रपुर, उधम सिंह नगर, उत्तराखंड, फोन नंबर – 05944-242111, 245999, फोन फैक्स नंबर – 05944-353901
